२१ बैशाख २०८३, सोमबार

आज की शाम, गंगा मैडम के नाम !

एसीपी संवाददाता

२५ जेष्ठ २०७७, आईतवार १३:२५ मा प्रकाशित

लेखक अधिवक्ता राम कुमार दीक्षित

गंगा मैडमको हिन्दी से बहुत नफरत हैं । किसीको हिन्दी बोल्ते हुये सुनती है, देखती है तो उनका खून खौलने लगता है । उनका खून उतना उबल जाता है कि अगर तत्काल चावल छोड दिया जाये तो भात बनकर तयार हो जायेगा । हिन्दी बोलने वाले शत–प्रतिशत गंगा मैडमको भारतीय लगते है । उनके अन्दर उसकी भारतीय छबि बन जाती है । क्योंकि भारतीय लोग हिन्दी भी बोलते हैं ।

मैडम जिस भाषाको नेपाली बताती हैं, अगर उसीको नेपालका भाषा मान लिया जाये तो भारत ने अपने संबिधान मे २००३ मे सुचीकृत कर लिया है, करो आन्दोलन ! जलाओ भारतीय झण्डा ! ! मैडम को नेपाली भाषा के अतिक्रमण के बिषय मे भी आन्दोलन करना चाहिए । इस बिषयको भी राष्ट्रियताका मुद्दा बनाना चाहिए ।

मच्छर जितना भी काटे सभीको मलेरिया नहीं होता, मलेरिया उसीको होता है, जिसेके अन्दर पहिले से मलेरिया के भाईरस मौजूद हों । उसी तरह वें सब हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु भाषा बोलने वाले लोग गंगा मैडमको भारतीय लगते हैं । क्योंकि उनके पूर्वज भी भारतीय से नेपाली मे परिवर्तन हुये हैं । संयोग से मैं और गंगा मैडम दोनो एक साथ भारतीय से नेपाली बने हैं । सन १८६० में वह भू–भाग जहाँ गंगा मैडम और मेरा जन्म स्थल है, नेपाल मे न आया होता तो हम दोनो भारतीय होते । इसलिए जब कोई हिन्दी बोलने वाला उन्हे दिखता है तो गंगा मैडमको सगोत्री लगता और आप सब जानते ही है कि सगोत्रीको काटना आसान होता है चाहे वह इंसान हो या जानवर ।

गंगा मैडमको अपने वफादारी के आगे कुछ दिखायी ही नही देता । वह यह भी भूल जाती है कि जिस संबिधानको माननेका शपथ उन्होने लिया है, संबिधान के अन्दर जो भी बातें लिखी हुई हैं, बिना घृणा और द्वेष के मानने के लिये बाध्य है । वह संबिधान ही कहता है कि नेपाल बहु–भाषिक देश है, नेपाल के सीमा के भीतर जितनी भाषाएं बोली जाती है, वह सभी नेपाली हैं । इस अर्थ मे हिन्दी भी नेपाल की ही भाषा हुयी, लेकिन बेचारी गंगा मैडमको कौन सम्झाए, जो अपनी भाषा छोड देता है, उसे पागल कहते है लोग । जैसे तोता– वह जब सीताराम कहता है, तो लोग खुश होते है कि मेरी भाषा सीख गया, लेकिन असलियत कुछ और होता है–वह पागल हो जाता है । आदमीको ही देखो, जब वह पागल होकर सडक पर घूमता है, तब अपनी भाषा नही बोलता, ऐसी भाषा बोलता है जो समझ से बाहर होता है । वह खुद नही जानता है– वह क्या बोल रहा है ? ऐसी ही हालत गंगा मैडम की है । उन्हे क्या कहा जाय आप सब खुद बिचार कीजिए– पागल या और कुछ ।

संसदमे बोलने से पूर्व अगर संबिधान पढ लिया होता……….। बेचारी गंगा मैडम ! कमैया मुक्ति हो गया लेकिन मैडम अभी भी पुर्खोका ऋण चुक्ता कर रही हैं । आदत पड गयी, इतनी जल्दी छूट्ने वाली हो तब न ! अपने ही जैसे मैडम सभीको समझती है, जैसे स्वयं अपना पहचान भूल गयी, कमैयापन के चक्कर मे, वैसे ही चाहती है सभी लोग अपना अपना पहचान भूल जाये । मैडमका खून इतना उबलने लगता है कि वह भूल जाती है कि नेपालका हर आदमी अपनी भाषा बोलने के लिये स्वतंत्र है, स्वयं तो कमैया बनी है बेचारी दूसरोको भी बनाना चाहती है– आओ तुम भी कमैया बन जाओ, यहां सुख सुबिधा बहुत है । गंगा मैडम के मालिक ने प्रयास किया भी था लेकिन सफलता हाथ नही लगी ।

मुझे एक मित्र ने बताया मैडम शाकाहारी है, लेकिन शाकाहारी लोगों मे सतोगुण होता है, उनका खून कभी उबलता ही नही है । अगर मैडमका खून उबला है तो निश्चित रुपसे शोचनीय बिषय है, और दूसरी बात मैडम जय गुरुदेव की भक्त भी हैं, ऐसे मे जब वह अपने गुरु से मिलने जाती है भारत मे, तो कौन सी भाषाका प्रयोग करती हैं ? तय है कि हिन्दी ही बोलना पडता होगा, तब बेचारी मैडमका राष्ट्रवाद कहाँ चला जाता होगा ? बेचारी मैडमको अपने गुरु से हिन्दी मे बात करते समय बहुत ही कष्टका सामना करना पडता होगा । यहीं पर नोट करने वाली बात यह है, कि वह अपने जीवन को चलाने के लिये अगर दूसरी भाषाका प्रयोग करती हैं तो हिन्दी भाषियोको गाली करके केवल अपने मालिकको रिझाने के अतिक्ति कुछ भी नही है ।

भाषा किसी भी सीमा के भीतर कैद होकर नही रह सकता । मैडम, जिस नेपाली भाषाकी बात करती है, वह नेपालका अपना मौलिक भाषा ही नही है । यह खस भाषा है, जिसमे हिन्दी, संस्कृत, उर्दु, अंग्रेजी लगायत अन्य भाषा के आगन्तुक और अपभ्रंश किये गये शब्दोंको प्रयोग किया गया है । जैसे पोषाक–राजस्थान से लबेदा ले आए, इंगलैण्ड से कोट और ढाका से टोपी और बना दिया नेपाली राष्ट्रिय पोषाक । नेपाली भाषा वही है, जो नेपाल (काठमाण्डू भैली) मे बोला जाता था और बोला जाता है , जो वहां के स्थानिय निवासी लोग बोलते है, वह है “नेवारी” । मैडम जिस भाषाको नेपाली बताती हैं, अगर उसीको नेपालका भाषा मान लिया जाये तो भारत ने अपने संबिधान मे २००३ मे सुचीकृत कर लिया है, करो आन्दोलन ! जलाओ भारतीय झण्डा ! ! मैडम को नेपाली भाषा के अतिक्रमण के बिषय मे भी आन्दोलन करना चाहिए । इस बिषयको भी राष्ट्रियताका मुद्दा बनाना चाहिए । नेपाल के जनसंख्या मे १०÷१५ प्रतिशत लोग ही नेपाली बोलते है, बाकी सब अपनी स्थानीय भाषा बोलते हैं, लेकिन नेपाल की पूरी जनसंख्या से सैकडों गुना अधिक लोग बिदेशों मे नेपाली बोलते है, जो नेपाली नागरिक नही हैं । उसी तरह भारतमे जितने हिन्दी बोलने वाले लोग है, उससे सैकडों गुना लोग बिदेशों मे हिन्दी बोलते हैं । भारत के संसद मे नेपाली भाषा मे शपथ लिया जाता है, भारत के प्रधानमन्त्री नेपाली भाषा मे संसदको सम्बोधन करते हैं, तो उन पर, वहाँ पर कोई प्रश्न नही उठता, क्योकि यही लोकतन्त्र की बिशेषता है । भाषा अभिब्यक्तिका माध्यम है, आदमी वही भाषा प्रयोग करता है जिस भाषा मे अपनी भावना अभिब्यक्त करने में सरलता हो । अब मैडम जी अपनी भाषा, अपना भेष छोडकर गुलामी पसंद हो गई हैं, अपने जीजा की भाषा बोलने लगी हैं, तो हर लोग तो वैसे नही हो सक्ते ।

मैडम सेलेक्टेड सांसद है, अगर इलेक्टेड होती तो उन्हे बोलते समय अपने उन मतदाताओं का ख्याल आता जिसने उन्हे मत देकर वहाँ बोलने के लिए भेजा है । मतदाता अपनी भाषा सुनना पसंद करते हैं या दूसरे की । तब उन्हे एहसास होता कि उनके मतदाता क्या चाहते हैं ? मालिकों के आदेशानुसार नेपाली भाषा को मैडम राष्ट्रियता का मुद्दा बनाना चाहती है, तो वह भाषा सीधे तौर पर बिदेशी भाषा है, कारण, बिदेशों मे नेपाली बोलने वालो की संख्या बहुत अधिक है । मैडम जी जिसकी भाषा बोलती हैं, वे लोग आपकी भाषाको कभी भी स्वार्थ के अतिरिक्त सम्मान नही कर सक्ते, इसलिए अपना, अपनी भाषा, अपने भेष, अपनी संस्कृती के सम्मान के लिए भी लडना जरुरी है । वह ताकत मैडम मे अब नही रहा, जब– के.पी. ओली आसाम का, माधव नेपाल बिहार का, शुसिल कोईराला बनारस का, शेरबहादुर देउवा उत्तराखण्ड का बताकर उन सभीको ललकारती थी । मधेशियो को गाली देने से किसीको संतुष्टी हो सक्ती है, लेकिन इससे मैडमके लोकप्रियता मे बढत नही होगी, न ही थारु समुदायका समर्थन ही मिल पाएगा ।

प्रधानमन्त्री के.पी.ओली हिन्दी मे पत्रकार सम्मेलन करते है, तो मैडमको कोई अपत्ती नही होती है, लेकिन सरिता गिरी के बोलने मे आपत्ती है । गिरगिट की तरह रंङ्ग बदलना भी सीख चुकी है, मैडम । गंगा मैडम ने ही एक जनसभाको सम्बोधन करते हुए, अपने आज के मालिकोंको भारतीय बताया था, लेकिन वें सब आज उनके मालिक हो जाने के कारण से, अपनी वह सही बातें भूल गई हैं, लेकिन मैडमको याद रख्ना चाहिए कि वे सब खस ब्रàण आपके अभिब्यक्ति को कभी नही भूलेंगे, यूज एण्ड थ्रो का सिद्धान्त है उनका । मैडम जी के मायके मे भी नेपाली नही बोला जाता, और मैडम स्वयं अपनी ही भाषा बोलकर बडी हुई हैं । नेपाली नागरिकता लेते समय मैडमको भी सिद्ध करना पडता है, कि मेरा जन्म, मेरो पिताका जन्म, मेरा सात पुस्ताका जन्म नेपाल मे ही हुआ है, क्योंकि बोर्डर उसपार भी गंगा मैडम के रिस्तेदार ही रहते हैं । पहचानका समस्या मैडम को भी है । लेकिन मालिक तो मालिक होता है, मालिक को खुश करने के लिये अपने दुःख, दर्द, पहिचान, स्वाभिमान, सम्मान को ताख मे रखकर अपमान सहकर भी काम तो करना ही पडता है । धुलीखेल के एक सज्जन ने मुझे बताया था–हिन्दी भाषा न बोलें तो लाखों लोग भूखे मर जाएंगे और चाईना रेडीमेड कपडे न भेजे तो हम सब नंगे घूमेंगे । वैसे गंगा मैडम के काम से मैं संतुष्ट हुं ! कम से कम तावेदारी से ही कुछ भला हो जाय । शुभ–संध्या ! लेखक तथा अधिवक्ता रामकुमार दिक्षितका अनुसार सत्य तथ्य सहितको निजी बिचार हो ।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
laxmi mahato
laxmi mahato
5 years ago

गंगा चौधरीको नेचर-अधजल गगरी छलकत जाय ।

1
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x