★महिला-किसान समस्या-गीत★
रचना- प्रदीप सारंग,
खेती सगरिउ चरि गए साँढ़,
बपइया मोरे अब का करी।
एकै बिगहा धान रहै कुल, मेहनत केर गवाह।
छुट्टा डाँगर चरि गये खेती, देखि कै निकरै आह।।
बप्पा अँसुवन कै धार सुखानि,
इनहू कै गति सब बिगरी।
खेती सगरिउ चरि गए साँढ़…………..
लरिका बच्चा कइसन जीहैं, कइसन बिटियक ब्याह।
कइसन कर्ज बेसार का उतरी, सूझि परै न राह।।
दादा दिनौ-दिन उधारी बढ़ि जाइ,
हमारिउ दशा कब सुधरी ?
खेती सगरिउ चरि गए साँढ़…………..
झुण्ड झुण्ड साथै मा घूमैं, बछिया बछवा गाय।
गौरक्षा कानून के आगे, कौनौ नहीं उपाय।।
जरिया सबधरि मिटिगै भाय,
बताऊ कइसन का सपरी।
खेती सगरिउ चरि गए साँढ़…………..
जेहिके ख्यात मा गाज गिरी ऊ जिन्दै मा मरि जाय।
कइव साल उबरै मा लागी, कतनौ करी उपाय।।
बढ़िगै रातिउ कै रखवारि,
किसानन का जू कब लौं जरी।
खेती सगरिउ चरि गए साँढ़…………..
(लोक धुन आधारित इस गीत की रचना प्रदीप सारंग द्वारा


