तपन राष्ट्रवाद का !

नेपाल मे फिलहाल तीन भट्ठियाँ धधक रहीं हैं । एक कोरोना भाईरस ( कोभिड–१९), दूसरा सूरज और तीसरा राष्ट्रवाद ! राष्ट्रवाद के तापमान ने प्राकृतिक तापमान और कोरोना के तापमान को बहुत दूर पीछे छोड दिया । कई दिनो से राष्ट्रवाद का पारा उपर की तरफ जा रहा था धीरे धीरे । लेकिन कल अचानक तेजी से पारा उपर भागा तथा और आगे भागने की उम्मीद है ।
कोरोना भाईरस (कोभिड–१९) के नियंत्रण के प्रश्न पर सरकार निरुत्तर है, चारो तर्फ से घिर चुकी है । लाखों लोग बेहाल हैं, क्वारेन्टाईन मच्छर को प्यारे लगते ही थे, सापों को भी प्यारे लगने लगे । इससे ज्यादा क्वारेन्टाईन के बदहाली का चित्रण नहीं किया जा सकता । राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने भी देश भरके क्वारेन्टाईन के बदहाली पर दुःख ब्यक्त किया । क्वारेन्टाईन मे रहने वालोंका जीवन संकट मे है । कोरोना भईरस (कोभिड–१९) नियंत्रण के नाम पर अरबों का लूट मचा हुआ है । राष्ट्रपति भी मौका मे चौका मार्ने की शोंच रही हैं, करोड का कार्पेट बदलकर । कोरोना भईरस (कोभिड–१९) को सामाजिक स्तर मे फैलने का खतरा बढता ही जा रहा है । कोरोना भईरस (कोभिड–१९) की लपटें इतनी तेज हैं कि सरकार को जमीन पर पैर रखने का जगह नही मिल पा रहा है ।
जिसमे नेपालीपन है, वही राष्ट्रवादी है । पहाड मे निवास करने वाले एक ही भाषा और भेष के एक ही संस्कृति के मानने वाले, खस आर्य जाति के लोगों का समूह और उस समूह के समृद्धि का भावना ही नेपाली राष्ट्रवाद मे सीमित होकर रह गया । बाकी जो नेपाली भाषा नही बोलता है, उस खस आर्य की संस्कृति को नही मानता है, जो उनका पोषाक नही पहनता है । वह राष्ट्रवादी नही हो सकता । हां ! एक आधार और है राष्ट्रवादी बनने का उस राष्ट्रवादी समूह के सभी निर्णयो का आँख मूँदकर (हनुमान भक्त बनकर) जो समर्थन करता है, भक्तिभाव में कोई कमी नहीं आनेदेता है, वह भी राष्ट्रवादी बन सकता है ।
जब सरकार के हाथ असफलता के अतिरिक्त कुछ नही लगता तो जनताका ध्यान बिकेन्द्रित करने के लिए राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाती है और जनता का ध्यान बांटकर चैन की सांस लेती है, सरकार ! यहाँ की ये नई चलन नहीं है । राष्ट्रवाद को सत्ता तक पहुंचनेके सिढीं के रुपमे प्रयोग करने का अभ्यास हमेशा होता आया है और आज भी जारी है, लेकिन बर्तमान समय में राष्ट्रवाद को असमय ही उछलना पडा कोरोना के चलते । मुख्य मुद्दा कोरोना भईरस (कोभिड–१९) नियंत्रण सरकार के लिये होना चाहिये लेकिन असफलता से बचने का माध्यम् बनाया राष्ट्रवाद को !
राष्ट्रवाद है क्या ? क्या अभी धधकने वाला भावना ही राष्ट्रवाद है ? या और कुछ । इससे पहले राष्ट्र के बारे मे थोडा लिखना जरुरी है–राष्ट्र, राज्य और देश, पर्यायवाची शब्द है, प्रायः आम लोगों की धारणा यही है, लेकिन राष्ट्र, राज्य और देश मे काफी अन्तर है । एक निश्चित भूगोल, उस भूगोल मे रहने वाली जनता और स्वतंत्र सरकार राष्ट्र है । नश्ल, जाति, भाषा, प्रथा तथा धार्मिक एकता जैसे तत्वो से राष्ट्र का निर्माण होता है । एक मान्यता यह है, और दूसरी मान्यता “राष्ट्र के अन्दर एक ही भाषा बोलने वाले या एक ही जाति समूह के लोग नहीं रहते वरन् राष्ट्र उस समूहको कहते है, जिसमें लोगों ने अतीत मे बडे–बडे काम मिलकर किये हैं और जिन्हे वे भविष्य मे आगे बढाना चाहते हैं ।” इन्ही दो बिचारधाराओं के आधार पर लोग अपनी अपनी धारणाएं बनाते हैं ।
किसी भी राष्ट्र का एक भूगोल होता है, नेपाल का भी है । इस भूगोल के अन्दर बिभिन्न जाति, भाषा, धर्म, संस्कृति के लोग निवास करते हैं और जब बिभिन्न भाषा, धर्म के लोग हैं, तो उन सब की बिचारधारा भी फरक होना स्वाभाविक है । सभी बिचारधाराओं का पहिचान, पहिचान का सम्मान राष्ट्र की एकता को मजबूत बनाता है । जिसमे उनकी भाषा का सम्मान हो, उसके संस्कृति का सम्मान हो, उसके मान्यता, रीतिरिवाजों, परम्पराओं का सम्मान हो । एक राष्ट्रका सामान्य राजनीतिक आर्दश यही है ।
लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नही हो सका । एक ही भूगोल पर निवास करने वाले, एक ही नश्ल के, एक ही भाषा, एक संस्कृति के लोगों ने अपने को वास्तविक नेपाली नागरिक माना । बाकी भूगोल को उपनिवेश (चारागाह) के रुप मे प्रयोग किया और वहाँ के निवासियो को समझा बिदेशी मजदूर । इसी आधार पर राष्ट्रवाद का बिकास होता गया । इसलिए नेपाल के अन्दर पहाडी भूगोल और उसपर निवास करने वाले एक भाषा, संस्कृति के नश्ल के समूह एक राष्ट्र, और मधेश भूगोल पर निवास करने वाले अलग संस्कृति भाषा के लोग अलग राष्ट्र बन गये और इसी आधार पर दोनो राष्ट्रवाद का बिकास होता गया ।
हम अपने परिवार मे रहते हैं, हमारा परिवार समृद्ध कैसे हो ? इसी भावना से परिवार के लोग सामूहिक रुपसे प्रयत्न करते हैं । इसी मान्यता के आधार पर परिवार के सदस्य जुडे रहते हैं । जैसे राष्ट्र एक जन–समूह से बनता है । उसी तरह अपनी बिचारधारा के आधार पर राष्ट्र (जन–समूह) को समृद्ध बनाने की उस जन–समूह की भावना को राष्ट्रवाद कहा जाता है । राष्ट्रवाद एक भावनात्मक, राजनीतिक मान्यता है, जो सीधे शक्ति संघर्ष से सम्बन्ध रखती है । मनुष्य अपने जैसे दूसरे ब्यक्तियो के साथ मिलकर रहना चाहता है, वह आत्म रक्षा के लिये सदैव सजग रहता है और इसके लिये दूसरो से लडता भी है ये सारी प्रबृतियाँ राष्ट्रवाद के अन्तर्गत समानिष्ट हो जाती है । संक्षिप्त मे राष्ट्रवाद, मनुष्य के लिये स्वतः प्रेरित नही है । एक सामान्य आदर्शों के आधार पर एक समूह को दूसरे समूह से अलग करती है ।
राष्ट्रवाद मनुष्य की जन्मजात प्रबृति नही है । परिस्थितियों के आधार पर राष्ट्रवाद बदलता रहता है । जैसे राजा पृथ्वी का राष्ट्रवाद, गोर्खा राज्य का बिस्तार और अपने नश्ल का प्रभुत्व कायम रखना था । राणाओं का राष्ट्रवाद अपने बंश का प्रभुत्व और सुरक्षा था । जर्मन जाति संसार का शासक बने, हिटलर का राष्ट्रवाद था, स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेजो को भगाना, भारत का राष्ट्रवाद था, तो बाद मे राष्ट्रिय एकता को कायम रखना । नेपाल में राजतन्त्र काल में राजा भक्ति ही राष्ट्रवाद था । जाति, धर्म आदि के संकीर्ण दायरों से उचें उठकर देश की चौमुखी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति करने का प्रयास राष्ट्रवाद है । एक मानव समूह (राष्ट्र) दूसरे मानव समूह (राष्ट्र) से भिन्न होने के कारण राष्ट्रवाद भी भिन्न होना स्वाभाविक है ।
भौगोलिक एकता, जातीय एकता, बिचारो की एकता, आदर्शो की एकता, भाषा की एकता, समान संस्कृति, धर्म की एकता लगायत ऐसे तत्व है, जो राष्ट्रवाद के भावना को मजबूद करते हैं । संक्षिप्त मे यह सभी भावनाएं और भावनानुरुप किये गये कार्य राष्ट्रवाद है, जो राष्ट्रहित मे हो । लेकिन दुर्भाग्य, नेपाल मे ऐसा न हो सका । कुलीनतन्त्र (राणा काल) मे काठमाण्डू भैली को ही नेपाल माना गया, वहां के निवासियो को ही नेपाली । लम्बे समय के बाद पहाड के अन्य भू–भाग के एक ही जाति को उस राष्ट्र के अन्तर्गत समाहित किया गया । बाकी आदिवासी, जनजाति, दलित और मधेश (तराई) के निवासियों को उस राष्ट्र मे समावेश होने का अवसर नही मिला ।
नेपाली राष्ट्रवाद का प्रमुख आधार नेपालीपन है, जो नेपाली भाषा बोल लेता हो, जिसका पहिरन एक हो, जिसकी संस्कृति शाक्त (शक्ति पूजा) हो, एक ही भूगोल (पहाड) में निवास करता हो, जिसकी नश्ल एक हो, उसे नेपालीपन कहते हैं और जिसमे नेपालीपन है, वही राष्ट्रवादी है । पहाड मे निवास करने वाले एक ही भाषा और भेष के एक ही संस्कृति के मानने वाले, खस आर्य जाति के लोगों का समूह और उस समूह के समृद्धि का भावना ही नेपाली राष्ट्रवाद मे सीमित होकर रह गया । बाकी जो नेपाली भाषा नही बोलता है, उस खस आर्य की संस्कृति को नही मानता है, जो उनका पोषाक नही पहनता है । वह राष्ट्रवादी नही हो सकता । हां ! एक आधार और है राष्ट्रवादी बनने का उस राष्ट्रवादी समूह के सभी निर्णयो का आँख मूँदकर (हनुमान भक्त बनकर) जो समर्थन करता है, भक्तिभाव में कोई कमी नहीं आनेदेता है, वह भी राष्ट्रवादी बन सकता है ।
राष्ट्रवाद जन्मजात भावना नही है, फिरभी खस आर्य के घर मे जन्म लेनेवाला हर शिशु जन्म लेते ही नही, जन्म से पूर्व ही राष्ट्रवादी बनजाता है । वह कुछ भी करे, अगर स्वजातीय है, तो राष्ट्रवादी ही रहेगा । वह नेपाल को ही बेंच दे, तो भी । क्योंकि नेपाली राष्ट्रवाद का तपन इतना तेज है, कि स्वजातिय द्वारा किये गये सभी देश बिरोधी पापकर्म पवित्र हो जाते है । उदाहरण के रुपमे महाकाली नदी को ही ले सकते हैं । ईष्ट इण्डिया कम्पनी और नेपाल के बीच हुये संधि के धारा ५ में “ नेपाल के राजा काली नदी के पश्चिम मे स्थित क्षेत्रों पर और उनके सम्बन्ध मे सदा के लिये अपने–अपने युवराजों के उत्तराधिकारियों के सभी अधिकार का परित्याग करते हैं और इस बात की प्रतिज्ञा करते है कि उन क्षेत्रों अथवा उनके निवासियों से कभी कोई सम्बन्ध नही रहेगा” उल्लेख है । इस धारा को ब्याकरणीय बिधि से ब्याख्या किया जाये तो काली नदी नेपाल का है और उस पर नेपाल का पूरा हक है, लेकिन आज के प्रमुख राष्ट्रवादी, प्रधानमंत्री के.पी.ओली, माधव कुमार नेपाल, शेर बहादुर देउवा, पशुपति शम्शेर राणा जैसे लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करते हुये संधि किया और पूरी काली नदी आधे मे सिमटकर रहगयी, नेपाल के हिस्से में । ऐसी राष्ट्र बिरोधी कार्य करने वालों के सभी पात्रों के पाप धुल गये । क्योंकि इस गतिबिधि मे संलग्न सभी स्वजातिय है । ऐसे ही– गण्डक और कोशी का हाल है । नेपाल के हित बिपरीत इसे भी बेंच दिया गया, राष्ट्रवाद का मुद्दा तो इसे होना चाहिये, न कि सरिता गिरी या उनका भाषा हिन्दी । सरिता गिरी का घर या किसी का घर तोड देने से, किसी को गाली देने से लिपुलेक, लिम्पियाधुरा कालापानी का समस्या समाधान नही होगा । तथ्य एवं प्रमाण के आधार पर कुटनीतिक या सैनिक समाधान इसका बिकल्प है । बिगत २०४ बर्षों से कालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेक नेपाल के नियन्त्रण से बाहर क्यों रहने दिया गया, यह एक गम्भीर प्रश्न है । सन २००८ से उस भूमि पर बन रहे सडक के सम्बन्ध मे नेपाल क्यों चुप रहा, उसी भूमि से होकर भारत और चीन के बीच हुये ब्यापार सम्झौता के बिषय में सरकार ने चुप्पी क्यों साध ली ? चीन के कब्जा मे रहे नेपाली भूमि के बिषयों मे सरकार का चूँ तक न करना कौन सा राष्ट्रवाद है ? ये सारे प्रश्न सरकारको कटघरे में खडा करने के लिए पर्याप्त हैं । अपने भूमि का लम्बे समय तक खोज खबर नकरना, वहाँ अपनी उपस्थिती न दिखाना, निश्चित रुप से शंकास्पद एवं घोर राष्ट्र बिरोधी कार्य है, या तो १८१६ के संधि के अनुसार कालापानी को भी काली नदी के पश्चिम का भू–भाग मानकर सरकार नें छोड दिया है, वहाँ पर अपनी उपस्थिती न होने का कारण जनता को जानना आवश्यक है, आज जब बिवाद उठ ही चुका है, तो उस भूमि की सुरक्षा के लिए, सेना को भेजने मे कंजूसी क्यों ? सरकार को अवश्य उत्तर देना चाहिए ।
सरिता गिरी ने जो कहा है, वही बात अन्य स्वजातीय लोगों नें भी कहा है । लेकिन उनपर न आक्रमण हुआ, न बिरोध । क्योंकि वें सब एक ही नश्ल के लोग हैं । लाउडा काण्ड, लाल पासपोर्ट काण्ड, धमिजा काण्ड लगायत काण्ड ही काण्ड से भरा हुआ है नेपाल । मनांङ्गे मनपरी से सोना तश्करी तक । लेकिन सब चुप ! संसद सार्वभौम होता है और प्रत्येक सांसद को अपनी बात अपनी भाषा मे, अपनी शैली मे, रखने का हक है और यह हक उसे नेपाल का संबिधान देता है और उसे यह भी हक है, कि किसी बिषय का समर्थन या बिरोध करे । किसी मुद्दे का बिरोध या समर्थन ही राष्ट्रवादी या गैर–राष्ट्रवादी का मापदण्ड नही हो सकता, यदि है तो यह नश्लीय राष्ट्रवाद है ।
एक समुदाय बिशेष को लक्षित करके उसे अपमानित करना, उसके अधिकारों को प्रयोग करने से बंचित करने का प्रयास नश्लवाद का उग्ररुप है । किसी भी लोकतान्त्रिक मर्यादा के बिरुद्ध है, अस्वीकार्य है । वैसे यह नश्लवादी राष्ट्रवाद नयाँ नही है, इस का प्रयोग लम्बे अर्से से होता रहा है । नश्लवादी राष्ट्रवाद नेपाल मे एक परम्परा बन गया है । इस परम्परा को कायम रखने में मधेश की अहम् भूमिका रहती आई है । नश्लवादी लोगों को मधेश ही संसद मे भेजता है, वही पर मधेश का एक भी ब्यक्ति पहाड से निर्वाचन मे सहभागिता के लिए टिकट भी नही पाता । फिर भी नश्लवादी राष्ट्रवादीयों को समर्थन जारी है ।
देश का सर्वोत्तम हित ही राष्ट्रवाद है । केवल सीमा के बिषय मे फेसबुक रंङ्ग देना राष्ट्रवाद नही है । देश के अन्दर रहे समस्याओं का ईमानदारी पूर्वक समाधान भी राष्ट्रवाद है । देश मे अभी कोरोना संकट है, सभी का ध्यान इसपर होना चाहिए । क्वारेन्टाईन मे लोग भूखे मर रहे हैं, बिना टेस्ट के दम तोड रहे हैं, तो वही पर कोरोना भाईरस (कोभिड–१९) के नाम पर अरबों का लूट, कौन सा राष्ट्रवाद है ? कोरोना के संकटकाल मे राष्ट्रपति को १ करोड का कार्पेट बदलने का शौक कौन सा राष्ट्रवाद है ? सरकार के द्वारा नश्लवादी बिचारधारा के आधार पर आम लोगों के साथ ब्यवहार करना राष्ट्रवाद नही, नश्लीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का धधकता हुआ अंगार है । यह बिभेद राजा पृथ्बी से लेकर के.पी.ओली तक जारी हैं, इसी कारण नेपाल एक राष्ट्र बनने से बञ्चित रह गया, क्योंकि फरक संस्कृति, फरक भाषा के आधार पर शोषण, अत्याचार, भेदभाव करके सहभागिता से बञ्चित किया गया । मधेश जब अपने अधिकारों की बात करता है, तब उसे साम्प्रदायिक, अलगाववादी, बिदेशी दलाल जैसे घृणित अलंकारों से बिभुसित किया जाता है, इसलिए यदि नेपालको एक राष्ट्र बनाना है, तो सभी बहिष्कृत समुदाय के भाषा, संस्कृति को स्वीकार करके एवं उन्हें सहभागी करके Nation Buliding Process से गुजरना पडेगा, यदि अब भी ऐसा न हो सका, तो एकल नश्लीय राष्ट्रवाद की तपन से, सब कुछ झुलसने मे देर नहीं लगेगी । सभी का कल्याण हो । शुभ–संध्या !
सन्दर्भ सामग्री–राजनीतिक कोष (डा.सुभाष कश्यप, डा.बिश्व प्रकाश गुप्त), राजनीति शास्त्र के तत्व– (आर.पी.बिज, रामजी लाल, पी.एल.भोला), अरस्तु की राजनीति । बिशेष सहयोग–देबेन्द्र मिश्र ।
लेखक रामकुमार दीक्षितको निजी बिचार हो ।



